मार्क के सुसमाचार के बारे में

मार्क का सुसमाचार नासरत के जीसस का सबसे प्राचीन लिखित रिकॉर्ड है, जिसे 65 ईस्वी के आसपास यीशु और उनके शिष्य पीटर के करीबी साथी ने लिखा था। मार्क पवित्र बाइबल का हिस्सा है — जो नए नियम की दूसरी किताब है। इसके 16 एक्शन से भरपूर अध्याय यीशु की विशिष्ट पहचान, शिक्षा और कार्यों को प्रकट करते हैं। गॉस्पेल का अर्थ है 'अच्छी खबर', और मार्क ने इस किताब को “ईसा मसीह के बारे में खुशखबरी” के रूप में वर्णित किया है।

सुसमाचार क्या है?

पवित्र बाइबल हमें सिखाती है कि सभी लोग हमारे पाप के लिए शर्म और न्याय के पात्र हैं। लेकिन अच्छी खबर यह है कि यीशु क्रूस पर मर गए और उन्होंने वह निर्णय लिया जिसके हम हकदार हैं। वह तीसरे दिन मरे हुओं में से जी उठा, यह साबित करने के लिए कि उसने उन सभी के पापों का भुगतान किया है जो उस पर भरोसा करते हैं। और जब हम प्रभु और उद्धारकर्ता के रूप में यीशु पर भरोसा करते हैं, तो परमेश्वर हमें पूरी तरह और हमेशा के लिए क्षमा कर देता है। हम परमेश्वर के साथ एक वास्तविक और बहाल संबंध का अनुभव करते हैं जो कभी खत्म नहीं होगा।

पढ़ने के लिए टिप्स

आप इस पुस्तक को अध्याय और कविता संख्याओं के आधार पर ब्राउज़ कर सकते हैं (अध्याय स्विच करने के लिए पृष्ठ के नीचे दिए गए लिंक देखें)। उदाहरण के लिए, 'मार्क 8:29' मार्क अध्याय 8, कविता 29 को संदर्भित करता है। क्योंकि बाइबल दूसरी जगह की एक पुरानी किताब है, इसलिए ऐसी कई चीजें हैं जिन्हें पहली बार में समझना आपके लिए मुश्किल हो सकता है। जब ऐसा होता है, तो परमेश्वर की मदद के लिए प्रार्थना करें, और यीशु के एक अनुभवी अनुयायी के साथ किताब पढ़ने पर विचार करें। अध्ययन करते समय bibleref.com जैसी ऑनलाइन टिप्पणियां भी आपकी मदद कर सकती हैं।

मरकुस

मरकुस 3

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1और वह आराधनालय में फिर गया; और वहां एक मनुष्य था, जिस का हाथ सूख गया था।
2और वे उस पर दोष लगाने के लिये उस की घात में लगे हुए थे, कि देखें, वह सब्त के दिन में उसे चंगा करता है कि नहीं।
3उस ने सूखे हाथ वाले मनुष्य से कहा; बीच में खड़ा हो।
4और उन से कहा; क्या सब्त के दिन भला करना उचित है या बुरा करना, प्राण को बचाना या मारना? पर वे चुप रहे।
5और उस ने उन के मन की कठोरता से उदास होकर, उन को क्रोध से चारों ओर देखा, और उस मनुष्य से कहा, अपना हाथ बढ़ा उस ने बढ़ाया, और उसका हाथ अच्छा हो गया।
6तब फरीसी बाहर जाकर तुरन्त हेरोदियों के साथ उसके विरोध में सम्मति करने लगे, कि उसे किस प्रकार नाश करें॥
7और यीशु अपने चेलों के साथ झील की ओर चला गया: और गलील से एक बड़ी भीड़ उसके पीछे हो ली।
8और यहूदिया, और यरूशलेम और इदूमिया से, और यरदन के पार, और सूर और सैदा के आसपास से एक बड़ी भीड़ यह सुनकर, कि वह कैसे अचम्भे के काम करता है, उसके पास आई।
9और उस ने अपने चेलों से कहा, भीड़ के कारण एक छोटी नाव मेरे लिये तैयार रहे ताकि वे मुझे दबा न सकें।
10क्योंकि उस ने बहुतों को चंगा किया था; इसलिये जितने लोग रोग से ग्रसित थे, उसे छूने के लिये उस पर गिरे पड़ते थे।
11और अशुद्ध आत्माएं भी, जब उसे देखती थीं, तो उसके आगे गिर पड़ती थीं, और चिल्लाकर कहती थीं कि तू परमेश्वर का पुत्र है।
12और उस ने उन्हें बहुत चिताया, कि मुझे प्रगट न करना॥
13फिर वह पहाड़ पर चढ़ गया, और जिन्हें वह चाहता था उन्हें अपने पास बुलाया; और वे उसके पास चले आए।
14तब उस ने बारह पुरूषों को नियुक्त किया, कि वे उसके साथ साथ रहें, और वह उन्हें भेजे, कि प्रचार करें।
15और दुष्टात्माओं के निकालने का अधिकार रखें।
16और वे ये हैं: शमौन जिस का नाम उस ने पतरस रखा।
17और जब्दी का पुत्र याकूब, और याकूब का भाई यूहन्ना, जिनका नाम उस ने बूअनरिगस, अर्थात गर्जन के पुत्र रखा।
18और अन्द्रियास, और फिलेप्पुस, और बरतुल्मै, और मत्ती, और थोमा, और हलफई का पुत्र याकूब; और तद्दी, और शमौन कनानी।
19और यहूदा इस्करियोती, जिस ने उसे पकड़वा भी दिया॥
20और वह घर में आया: और ऐसी भीड़ इकट्ठी हो गई, कि वे रोटी भी न खा सके।
21जब उसके कुटुम्बियों ने यह सुना, तो उसे पकड़ने के लिये निकले; क्योंकि कहते थे, कि उसका चित्त ठिकाने नहीं है।
22और शास्त्री जो यरूशलेम से आए थे, यह कहते थे, कि उस में शैतान है, और यह भी, कि वह दुष्टात्माओं के सरदार की सहायता से दुष्टात्माओं को निकालता है।
23और वह उन्हें पास बुलाकर, उन से दृष्टान्तों में कहने लगा; शैतान क्योंकर शैतान को निकाल सकता है?
24और यदि किसी राज्य में फूट पड़े, तो वह राज्य क्योंकर स्थिर रह सकता है?
25और यदि किसी घर में फूट पड़े, तो वह घर क्योंकर स्थिर रह सकेगा?
26और यदि शैतान अपना ही विरोधी होकर अपने में फूट डाले, तो वह क्योंकर बना रह सकता है? उसका तो अन्त ही हो जाता है।
27किन्तु कोई मनुष्य किसी बलवन्त के घर में घुसकर उसका माल लूट नहीं सकता, जब तक कि वह पहिले उस बलवन्त को न बान्ध ले; और तब उसके घर को लूट लेगा।
28मैं तुम से सच कहता हूं, कि मनुष्यों की सन्तान के सब पाप और निन्दा जो वे करते हैं, क्षमा की जाएगी।
29परन्तु जो कोई पवित्रात्मा के विरूद्ध निन्दा करे, वह कभी भी क्षमा न किया जाएगा: वरन वह अनन्त पाप का अपराधी ठहरता है।
30क्योंकि वे यह कहते थे, कि उस में अशुद्ध आत्मा है॥
31और उस की माता और उसके भाई आए, और बाहर खड़े होकर उसे बुलवा भेजा।
32और भीड़ उसके आसपास बैठी थी, और उन्होंने उस से कहा; देख, तेरी माता और तेरे भाई बाहर तुझे ढूंढते हैं।
33उस ने उन्हें उत्तर दिया, कि मेरी माता और मेरे भाई कौन हैं?
34और उन पर जो उसके आस पास बैठे थे, दृष्टि करके कहा, देखो, मेरी माता और मेरे भाई यह हैं।
35क्योंकि जो कोई परमेश्वर की इच्छा पर चले, वही मेरा भाई, और बहिन और माता है॥

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